चाय
वो बरसती शाम और तेरा कंपकंपाते हाथो से चाय लाना फिर थोड़ा झिझकते हुए लरज़ते होठों से गिलास लगाना और उसकी ओट से चोरी चोरी मुझसे ऑंखे लड़ाना मै देखू तो सिहर कर सिमट जाना अब भी याद है मुझे जाने कहाँ खो गये हैं पल वो सुकूं के
वो सभी बातें जो कहना तो चाहते हैं पर कह नहीं पाते। फिर लफ्ज़ हर्फ़ों में ढल कर कुछ यूं बयां होते हैं ।